ग़ज़ल- न जाने क्यूँ भला मशहूर होकर भूल जाता है

ग़ज़ल- न जाने क्यूँ भला मशहूर होकर भूल जाता है
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मेरा साया है लेकिन दूर होकर भूल जाता है
कि वह सत्ता के मद में चूर होकर भूल जाता है
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सियासतदां को जनता ही उठाती है गिराती भी
मगर किस बात पर मगरूर होकर भूल जाता है
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रिवायत है जमाने की यहां हर शख्स यारों को
न जाने क्यूँ भला मशहूर होकर भूल जाता है
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कमी थी जब तलक हमसे वो अक्सर मेल रखता था
कि अपनो को भी जो भरपूर होकर भूल जाता है
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उसी के ही लिए ‘आकाश’ आँखें भीग जातीं क्यूँ
हमें आदत से जो मजबूर होकर भूल जाता है

– आकाश महेशपुरी

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