ग़ज़ल- दिल मे खुद्दारी रखो, अपनी छवि न्यारी रखो

दिल मे खुद्दारी रखो, अपनी छवि न्यारी रखो।
गफलतों में मत पड़ो, बस समझदारी रखो।

यार से यारी रखो, दुश्मनी प्यारी रखो।
साथ छूटे या बने, बस वफादारी रखो।।

सत्य पर चलते रहो, राह से भटको नही।
वक़्त जब विपरीत हो, बस समझदारी रखो।।

ये बलाएँ आएँगी, फ़िर कला दिख लाएँगी।
हर विपत्ति काल में, बस वज़नदारी रखो।

कर्म को पूजा समझ, चाह फ़ल की छोड़ दो।
कर्मकांडो में न पड़, काम से यारी रखो।।

✍🏻अरविंद राजपूत ‘कल्प’
बह्रे- बसीत मुसम्मन सालिम
वज्न- मुस्तफएलुन फाएलुन मुस्तफएलुन फाएलुन
2122 212 2122 212

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 22

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share