ग़ज़ल- दागदा दामन था जिसका, आज वो मशहूर है

दागदा दामन था जिसका, आज वो मशहूर है।
चाँद पर धब्बे बहुत हैं फिर भी वो पुरनूर है।।

आज के इस दौर में, खाने को तो भरपूर है।
आदमी आदम को खाने, क्यों हुआ मजबूर है।।

गुम हुआ बचपन हमारा, आज के इस दौर में।
है बड़ा औहदा मगर, वो बचपना क्यों दूर है।।

खो गई इंसानियत अब, लुट रही अस्मत यहाँ।
निर्वसन इंसा से बेहतर, आज भी लँगूर है।।

‘कल्प’ कलयुग आ गया अब, पाप बन कर छा गया।
मन हुआ बेनूर तो कपड़ों से तन पर नूर है।।
2122 2122 2122 212

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 8

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share