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ग़ज़ल — तेरा ख़त जब मैं कलेजे से लगा लेता हूँ

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तेरे दिल को मैं निगाहों में बसा लेता हूँ।
तेरा ख़त जब मैं कलेजे से लगा लेता हूँ

तेरी यादों में छलकती हैं उनींदी आंखें
तेरी यादों में ही मैं गंगा नहा लेता हूँ

दिल में जन्नत का यकीं मेरे उतर आता है
जब तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में हवा लेता हूँ

तुझसे वाबस्ता हैं हाथों की लकीरें मेरी
इन लकीरों से ही अब तेरा पता लेता हूँ

ऐ क़मर ग़म के अंधेरों का मुझे खौफ़ नहीं
चाँद मेरा है उसे छत पे बुला लेता हूँ

— क़मर जौनपुरी

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