ग़ज़ल- जो अपने सामने हर शख़्स को कंकर समझता है

ग़ज़ल- जो अपने सामने…
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जो अपने सामने हर शख़्स को कंकर समझता है
ज़माना ऐसे लोगों को कहाँ बेहतर समझता है

जरा सी हो गई शोहरत तो अपनी शान के आगे
वो अपने बाप को भी आजकल कमतर समझता है

बहुत है मतलबी बंदा नगर में जा बसा जबसे
जहाँ पैदा हुआ उस गाँव को बंजर समझता है

उसे पहुँचा दिया मैंने सफलता की बुलंदी पर
न जाने क्यों मुझे ही राह का पत्थर समझता है

बुलाते हैं मुझे लेकिन ग़ज़ल पढ़ने नहीं देते
कि इस अपमान के ग़म को महज़ शायर समझता है

चलाओगे अगर “आकाश” सीना चीर ही देगा
किसी की वेदना को कब कोई खंजर समझता है

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 18/02/2020

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