ग़ज़ल- चोट देने मुझे रुलाने आ

ग़ज़ल- चोट देने मुझे रुलाने आ
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
चोट देने मुझे रुलाने आ
फिर से जलवा वही दिखाने आ

अब तो खुशियाँ हमें डरातीं हैं
ग़म की दुनियाँ जरा बसाने आ

मेरे आँसू उदास रहते हैं
इनको फिर से गले लगाने आ

अब ये आहें भी आह भरतीं हैं
झूठे वादे लिये पुराने आ

कौन जाने “आकाश” क्या होगा
वक्त को भी तूँ आजमाने आ

– आकाश महेशपुरी

Like Comment 0
Views 170

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share