ग़ज़ल/गीतिका

उम्मीद को आंखों से बिखरते देखा,
हौसलें टूटे हैं और टूट के गिरते देखा,
हुनर कैसे कोई चांद पे जाने का रखे,
मैंने इंसान को इंसान से मिटते देखा।
कहाँ गए वे आग को पत्थर से जलाने वाले,
लगी हो प्यास तो पानी से बुझाने वाले,
इंसा-ए मौजूद रहे सियासत की न डोर हिला,
जाति में जाति का जहर मिलाने वाले।
गुलशन सुर्ख़ रहे जन्नत की दीवारों से,
घर चमक उठता है अपने ही परिवारों से,
अब्र इंसान को कमजोर किया करती है,
अब तो बचाये कोई वतन को गद्दारों से।
कितनी मुश्किल से तस्वीर बना करती है,
घिसने के बाद ही तक़दीर बना करती है,
भरम यह है कि वह कोई तो कमाल करे,
मलाल ये कि बस ताबीर बना करती है।
खरोंच डाले अपने जिस्म को नखूनों से,
यहां चलता नहीं निज़ाम बस कानूनों से,
रौशन जहां में उम्मीद बर बाकी हैं,
बाज़िया जीती गयी हैं यहां जुनूनों से।
रौशनी मन्द हुई तो वह आफताब हुआ,
रोया दुनिया के लिए और वो किताब हुआ,
नौजवानों कदम बढ़ाओ न बरबाद करो,
मेरे लिए तो वही बस मेरा ख्वाब हुआ।

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