ग़ज़ल- चलेगी एक तेरी क्या समय बलवान के आगे

ग़ज़ल- चलेगी एक तेरी क्या समय बलवान के आगे
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अगर इतरा रहे हो तुम जो अपनी शान के आगे
चलेगी एक तेरी क्या समय बलवान के आगे

ये माना आसमाँ का भी तू सीना चीर सकता है
मगर तू जा नहीं सकता कभी शमशान के आगे

ग़मों की आँधियों में भी खुशी के सिलसिले देखो
कि ग़म टिकता कहाँ कोई तेरी मुस्कान के आगे

हमारा यार होता तो सभी दुखड़े सुना देता
मगर अच्छा नहीं लगता किसी अनजान के आगे

अगर वो जा चुका है तो महज रोना है हाथों में
तुम्हारा वश चलेगा क्या कभी भगवान के आगे

जडें ‘आकाश’ होतीं हैं तभी ये फूल खिलते हैं
मगर वो भूल जाता है जरा पहचान के आगे

– आकाश महेशपुरी

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