Skip to content

ग़ज़ल।मेरे हमदम मेरी तनहाइयाँ फिर नापने निकले ।

रकमिश सुल्तानपुरी

रकमिश सुल्तानपुरी

गज़ल/गीतिका

October 6, 2017

=================ग़ज़ल================

मेरे हमदम मेरी तनहाइयाँ फ़िर नापने निकले ।
कि मेरे इश्क़ की गहराइयाँ फ़िर नापने निकले ।

सिसकती रूह की परछाइयाँ फ़िर नापने निकले ।
बिछा दिल रूप की मदहोशियाँ फ़िर नापने निकले ।

नजऱ के ख़ंजरों के दम लगाकर आग़ तन मे वो ।
मेरे क़िरदार की दमदारियाँ फ़िर नापने निकले ।

मुहब्बत मे हक़ीक़त का भरोसा न रहा जिनको ।
लुटे जज़्बात की कमजोरियाँ फ़िर नापने निकले ।

दग़ा से ख़ून- ऐ- आँसू हुए काफ़ूर जब देखा ।
रुआँसी आँख की रुसवाईयाँ फिर नापने निकले ।

चुभो नश्तर ज़िगर को वो कुरेदा कर रहे हर पल ।
कि चेहरे पर रुकी खामोशियाँ फिर नापने निकले ।

नज़ाक़त से मुहब्बत मे बनाकर फासलें ‘रकमिश’।
ग़मो से से मंजिलों की दूरियाँ फिर नापने निकले ।

✍रकमिश सुल्तानपुरी ।

Share this:
Author
रकमिश सुल्तानपुरी
रकमिश सुल्तानपुरी मैं भदैयां ,सुल्तानपुर ,उत्तर प्रदेश से हूँ । मैं ग़ज़ल लेखन के साथ साथ कविता , गीत ,नवगीत देशभक्ति गीत, फिल्मी गीत ,भोजपुरी गीत , दोहे हाइकू, पिरामिड ,कुण्डलिया,आदि पद्य की लगभग समस्त विधाएँ लिखता रहा हूं ।... Read more

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you