गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल।इश्क़ मे यूँ ठोकरें खाये बहुत ।

==================ग़ज़ल=====================

इश्क़ मे यूँ ठोकरें खाए बहुत ।
दिल लगाकर हम तो पछताए बहुत ।

जिश्म की हरसूं सजी बाज़ार मे ।
बिक गया ईमान घबराए बहुत ।

मंज़िलें तो दूर राहें न मिली ।
मिल रहे थे दर्द के साए बहुत ।

दर्द से ज़्यादा ग़मों की मार से ।
दिल्लगी मे जख़्म हम पाए बहुत ।

आह पर भी लग गयी पाबन्दियां ।
अश्क़ सारे आँख तक आए बहुत ।

लग गयी क़ीमत मेरे जज़्बात की ।
ग़ैरतों की मार हम खाए बहुत ।

खो गयी रकमिश यहां पहचान भी ।
देख दिल को लोग मुस्काए बहुत ।

रकमिश सुल्तानपुरी

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