ग़ज़ल- आज बैठा हूँ मैं वीराने में

ग़ज़ल- आज बैठा हूँ मैं वीराने में
★★★★★★★★★★★
आज बैठा हूँ मैं वीराने में
सबको खोया है आजमाने में

कैसे कैसे सवाल करता है
जैसे बैठा हूँ उसके थाने में

साथ मेरे कलम न होती तो
वक्त कटता ये सर झुकाने में

माँगे मोटा वो हार सोने का
मैं तो पतला हुआ कमाने में

यूँ ना ‘आकाश’ ग़मज़दा होना
कौन दुखिया नहीं ज़माने में

– आकाश महेशपुरी

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