Skip to content

–ग़जल–दो रंग मोहब्बत के–

Radhey shyam Pritam

Radhey shyam Pritam

गज़ल/गीतिका

February 13, 2018

दो रंग मोहब्बत के होते हैं ज़माने में।
कुछ हँसते हैं लोग कुछ रोते हैं ज़माने में।।

हाथों की लकीरें हैंं ये मिट नहीं पाएंगी।
क़िस्मत के लेख हैं सब ढ़ोते हैं ज़माने में।।

नदियों की तरह हमकों चलते ही जाना है।
जो रुकते हैं लोग वो खोते हैं ज़माने में।।

अपनी ही करनी पर पछतावा करते हैं वो।
बीज बेवफ़ाई के जो बोते हैं ज़माने में।।

दिल का मिलना तो एक क़ुदरत की इबादत है।
प्यार के दुश्मन लोग क्यों होते हैं ज़माने में।।

एक सिक्के के दो पहलू सुने होंगे प्रीतम।
दो रंग न समझते वो सोते हैं ज़माने में।।

….राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
———————————————–

Share this:
Author
Recommended for you