गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ख़ुदकुशी करने के मैं रोज बहाने ढूँढने लगा हूँ

ख़ुदकुशी करने के मैं रोज बहाने ढूँढने लगा हूँ
जी में रड़क रही है साँसे जैसे मैं मरने लगा हूँ

सीने के जख्मों पे लौट कर कोई बहार आई है
सूना-सूना था भीतर से मैं अब खिलने लगा हूँ

कई बरसों की गर्द जमा थी आज तक चहरे पे
जी भर के जो रो लिया तो साफ़ दिखने लगा हूँ

मुद्दत से लापता है इक शख्स मुझमे ही कहीं
सहरा में दरिया के जैसे खुद को ढूँढने लगा हूँ

आँखों को आखिर कब तक धोखे में रखूँगा मैं
अब जागती हुई आँखो से ख्वाब देखने लगा हूँ

दर्द भरी साँसे भीतर न जाने कौन खिंच रहा है
रूह की तड़प देख के मैं और भी तड़पने लगा हूँ

खो गया न जाने कहाँ खामोशियों के अंदर मैं
चहरे से अब आईने की शनाखत करने लगा हूँ

साँसों का सारा तेल जल चुका पुरव के दिल से
मैं उम्मीदों का इक दिया हूँ जो बुझने लगा हूँ

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