ख़ताएँ बख़्श दो किरदार की

ख़ुदा को छू ले, तेरा यार आसमाँ पर है
यक़ीं के साथ तेरा प्यार अब वहाँ पर है

नहीं मिटेगी मुहब्बत ये मिटाये से भी
यक़ीं मुझे ऐ सितमगर ये इम्तिहाँ पर है

वजूद अपना बचायें भी तो कैसे और क्यों
क़ज़ा ले जाए भले सब्र अब सिनाँ पर है

ख़ता वो तीर भी तरकश में पड़ा है कब से
ये फ़ैसला तो मुहब्बत के इम्तिहाँ पर है

ख़ताएँ बख़्श दो किरदार की मेरे दिलबर
नज़र की ताब मेरे ग़म की दास्ताँ पर है

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