होले होले काय चतकनी खोलत हो

ऐचक वेचक राजा जी तुम डोलत हो
होले होले काय चतकनी खोलत हो
हम तुमखो समझारये काय न मानो तुम
नशा मे आके रोज खुपड़िया फोडत हो
मार मार खें मोखे बंगची कर डारी
फिर काय रोज पड़ोसन से तुम बोलत हो
सबरे जेवर तुमने गिरवी धर आने
फिर भी रोजई मेरे कान टटोलत हो
“कृष्णा” मानो बात हमारी अब सुनलो
रोजीना काय कल्ले पैना फोडत हो
✍ कृष्णकांत गुर्जर धनौरा
04/11/19-10:15pm

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