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होली

“होली”
आभा फागून की चारो ओर फैल रही
कहीं हरी कहीं लाल रंग मन को भिगो रही
रंग के फुहार से इधर-उधर
उड़त है अबीर रंग
कोकिला ने जब आवाज लगायी
बारह महिनों मे एक बार।

जहाँ तहाँ दगने लगी पिचकारी
रंग गयी मैं भी क्षणभर
होली आयी माँदर बजने लगे
पलाश भी जैसे बोल उठा
रंग जा मेरे रंग में
होली आयी होली आयी।

रंगो के सौंदर्य का श्रृगांर कर लो
मजहब को मिटा आपस में प्रेम कर लो
रंग भाईचारे का ऐसे लगाओ
जिसे कोई आंतक,सियासत न सके मिटा
यही है होली के रंगो का उपहार
होली आयी होली आयी
साथ में ये पैगाम लायी।

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