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होली हास्य हँसगुल्ले

फागुनी हवा में
श्रृंगार की चाशनी
हास्य के हसगुल्ले
मुक्तक
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1
समय नदी की तेज धार में बहना पड़ता है ।
जैसे समय रखे वैसे ही रहना पड़ता है ।

पहले अंकल जी सुनने में बहुत बुरा लगता था जी,
आज हमें दादा संबोधन सहना पड़ता है ।।
2

इस फागुन में दिल काआँगन, कोई हवा बुहारे तो ।
कोई मंजरी मास्क हटाकर, पल भर मुझे निहारे तो ।

चाह नहीं है भौतिक सुख की, चाह सिर्फ़ इतनी सी है ,
कोई रूप राशि की रजनी , सीधे नाम पुकारे तो ।

गुरू सक्सेना
नरसिंहपुर मध्यप्रदेश

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