होली छंद | अभिषेक कुमार अम्बर

हाय रे ! ये माह फ़ाग दिल में लगाये आग,
गोरियों को देख प्रेम उमड़े है मन में।
लगती हैं लैला हीर नजरों से मारें तीर,
बिज़ली सी दौड़ पड़े सारे ही बदन में ।
बन गया में शिकार हाय बैठा दिल हार,
उसकी ही सूरतिया बसी अखियन में।
दिल को नहीं करार होली का है इंतज़ार,
रंगों में रंगूँगा तुझे रंगीले सजन में।

©अभिषेक कुमार अम्बर

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