होली के छंद

*होली के छंद*

1

मस्ती का त्यौहार आया, प्रेम की बहार लाया,
देखो दिलवालों की है, गली गली टोली रे।।

हरा पीला लाल लाल, हाथों में ले के गुलाल
दिल में उल्लास लिये, दुनिया ये डोली रे।

झूम झूम गाये रहे, नाचे इटलाय रहे।
मतवाले घूम रहे ,खा के भंग गोली रे।

मस्तानों की टोली ले के, भिन्न भिन्न बोली ले के।
होली आई होली आई, होली आई होली रे।

2

अंग अंग है उमंग, पी के लोग खूब दंग।
भंग का नशा हवा में, होली की बयार है।

रंग और अबीर उड़े, गोरे गोरे गाल पर।
राधा की उम्मीद संग, कान्हा ही का प्यार है।।

पीले फूल सरसों के, टेसू फुले लाल लाल।
आई फिर होली उठे, मन में गुबार है।।

मथुरा की खुशबु का, गोकुल के हार का।
वृन्दाबन सुगंधी बरसाने की फुहार है।।

3
घनाक्षरी (श्रृंगार)

हंसी तेरी हरियाली, रूप है गेहूं की बाली,
आँखे तेरी किसलय है, चाल मतवाली है।।

नजरें उठा के देखे, बिजली गिरेगी वहीँ,
चले इटला के तू तो, मानलो भूचाली है।।

प्रकृति ने कुछ तुझे, ज्यादा ही दिया है मानों,
जुल्फें तेरी सावन की, घटा से भी काली है।।

संजीदा अदा भी तेरी गीतिका की बानगी है,
लब गजलें हैं तेरी, बोली मद प्याली है।।

4
मनहरण घनाक्षरी-

“काजल” लगाके चली,
नैना कजरारे करी,
चैन को चुरा ले गई,
अखियाँ कटार है।।

बिंदिया कपाल पर,
गोरे गोरे गाल पर,
काला वाला तिल करे
हिय पे प्रहार है।।

देखा रंग रूप तेरा,
घायल ये मन मेरा,
लग रहा मुझे मिली,
खुशियाँ अपार है।

जिया डोले हौले हौले,
मन मन में ही बोले,
होने वाली यही मेरी,
बागों की बहार है।।

-साहेबलाल ‘सरल’

मुक्तक

नहीं खेलो नहीं खेलो, यहाँ होली खिलाफत की।
नहीं अच्छी नहीं अच्छी, जो फितरत है हिकारत की।।
ये होली तो सिखाती है, सदा ही प्यार से हो लो।
सुनो मानों मेरा कहना, बुरी आदत बगावत की।।

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