होली की चौपाल

बंदर के घर लगी हुई थी,
होली की चौपाल,
सभी जानवर मस्ती में थे,
उड़ने लगा गुलाल!

ऊंचे स्वर में आज गधे ने,
गाई लम्बी फाग।
भालू दादा ढोलक लेकर,
मिला रहे थे राग।
नहीं किसी का सुर मिल पाया,
मिली न कोई ताल!
बंदर के घर. . .

तभी वहाँ गुब्बारे लेकर,
आया एक सियार।
बोला सबको बहुत मुबारक,
होली का त्योहार।
आओ देखो गुब्बारों में,
हम लाये हैं माल!
बंदर के घर. . .

देखा तो इतने में भैया,
सक्रिय हुआ सियार।
फिर सबको गुब्बारे मारे,
कर डाली बौछार।
सबके चेहरे रंगे हुए थे,
काले, पीले, लाल!
भगदड़ चारों ओर मच गयी,
खतम हुई चौपाल!!

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