कविता · Reading time: 2 minutes

होली का दर्द

सुबह-सुबह स्वयं होली आई, हमसे होली खेलो भाई
देख होली का विकृत विकराल रूप
मैं मन ही मन घबराया, हिम्मत कर अंदर से फरमाया
तुम होली हो या कोई राक्षसी माया
तुम तो सुंदरता की देवी थी
रूप रस गंध की धवल धार थी
ममता की मूर्ति करुणा की यार थी
मानव की क्या तुम तो देवों का भी प्यार थी
हे देवी तुम्हारे रस यौवन से प्रेम के रंग छलकते थे
दुनिया करती थी पान उन्हें
तब मनके मदन मचलते थे
मांसल बदन तीखे नयन लाली थी तेरे गालों पर
अंग अंग में रंग भरा था खिले फूल थे गाने पर
तुम्हें देख सब खुश होते थे
सब मिल अपना गम धोते थे
साठ बरस के बूढ़े भी तेरी आंखों पर मरते थे
तेरे रूप समंदर मैं तब क्या क्या गुल खिलते थे
खुशबू तेरे यौवन की दसों दिशा महकाती थी
सुनकर तेरी राग रागिनी मेनका भी शर्माती थी
मस्ती थी तब अंग अंग में हर बस्ती हर आंगन में
मदमस्त झूमते थे किशोर पनिहारी की पायल में
प्रकृति के पावन रंगों से जब संसार नहाता था
भूल जाते थे राग देश नवप्रभात आ जाता था
कोई वर्ग या या मजहब हो सबसे तेरा नाता था
होली कुछ रोई फिर मुस्कुराई
अतीत में झांक कर बुदबुदाई
अभी तक जो तुमने कहा मैं उससे भी आगे थी
कर्म योगी कृष्ण की सखी सहेली थी
घटते हुए मानव मूल्यों से मैं कुरूप विकराल हो गई
काम क्रोध और शराब से पाशविक वृत्ति हो गई
सांप्रदायिक दंगों में मेरा चेहरा झुलस गया
बैरभाव राग द़ेष से रूप रस और रंग घट गया
पहले तुम मेरी आग में बुराइयां जलाते थे
अब मानव मूल्य जलाते हो
मानवता को ताक में रखकर पाप की आग लगाते हो
प्रेम नहीं मिलता है मुझको कहां छुपा है भाईचारा
भरत भूमि पर आज मचा है
अलगाव का कीचड़ काला
मेरे वक्ष स्थल पर तुमने बुराइयों के कई तीर मारे
माशल देह को भेदा है
अब मेरे विकराल रूप से डरते हो
दरवाजे बंद करते हो
हे कृष्ण फिर से आ जाओ
मेरा रूप मुझे दे जाओ
झूमे फिर से सब नर नारी प्यार की धार बहा
हे लेखक तुम कुछ लिखो
हे कवियों कुछ काव्य बनाओ
हे समाज के ठेकेदारों मुझ पीड़ित को गले लगाओ
मेरा रूप मुझे मिल जाए यही यज्ञ सब सफल बनाओ

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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