.
Skip to content

होली:भावनाओं के रंग!

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

लेख

March 10, 2017

हम घर किसे कहते हैं पता है आपको? चार दीवारें ,चिकना फर्श,गेट पर गुर्राता विलायती कुत्ता और भी बहुत कुछ —जी बिलकुल भी नहीं इसे हम मकान कहते हैं —नींद न आयेगी रात भर —लाख कोशिश कर लें।क्योंकि हमने भावनाओं के बरगद को घर समझा है ,महसूस किया है।
टूटी-फूटी झुपड़िया में हम बेफ्रिक सोते हैं ।
हमारे देश में भावनाएँ, उमंग, उत्साह, अल्लहड़ता,आनंद आदि सब कुछ हवा में बहता है ;हम इसे खरीदने बाजार नहीं जाते ।
हम प्रतिदिन आरती, भजन गीत नृत्य के साथ जीवन जीते हैं ।
यही सब कुछ झलकता है हमारे त्योहारों में ।
होली में हमारी उमंग उत्साह और अल्लहड़पन की भावनाएँ प्रस्फुटित हो उठती हैं और हम झूमझूम कर नाचने गाने लगते हैं और रंगों से जीवन में आनंद भर लेते हैं ।

होली है–शुभकामनाएँ के साथ :मुकेश कुमार बड़गैयाँ।

Author
मुकेश कुमार बड़गैयाँ
I am mukesh kumarBadgaiyan ;a teacher of language . I consider myself a student & would remain a student throughout my life.
Recommended Posts
चलो चले हम, गाँव चले हम! आओ चले हम, गाँव चले हम! ये झुटी नगरी, छोड़ चले हम! ये झुटे सपने, तोड़ चले हम! चलो... Read more
हम = तुम
हम अल्लाह तुम राम हम गीता तुम क़ुरान हम मस्ज़िद तुम मंदिर हम काशी तुम मदीना हम जले तुम बुझे तुम जले हम बुझे हम... Read more
*** दीवाने हो गये हैं हम  ****
दीवाने हो गये हैं हम दीवाने हो गये हैं हम नहीं हैं हम किसी से कम जहां में दौलते हैं कम नहीं हैं अब किसी... Read more
दो शरीर एक श्वांस हैं हम, एक दूजे के खास हैं हम। दूर भले हम कितने रह लें, दिल के मगर अति पास हैं हम।... Read more