होरी

*होरी ….!*
********
अब तौ धर दै ढोल मृदंग, खेलियो परकै फिर होरी ।
परकै फिर होरी, खेलियो परकै फिर होरी ।।
*
खूब भंग तैनै अबकै छानी,
बहुत करी अपनी मनमानी,
अब तौ सुध लै बाट जोह रही तेरी घर गोरी ।१
*
खाई चोट दृगन की भारी,
खूब चलाई भर पिचकारी,
धर दै याय अटा पै अब मत करियो बरजोरी ।२
*
गालन खूब गुलाल लगायौ,
लत्ता फारे मन हरषायौ,
अब तौ कर लै चेत घोरियो परकै फिर रोरी ।३
*
परकै फिर होरी आवैगी,
रंग भंग चंदन लावैगी,
कब जानै सुन रसिया टूटै साँसन की डोरी ।४
*
मिली पुण्य ते ब्रज की होरी,
श्यामा-श्याम हैं चंद्र-चकोरी,
‘ज्योति’ रँगी कान्हाँ के रँग में सतरंगी होरी ।५
*
-महेश जैन ‘ज्योति’
***
शब्दार्थ:
परकै-अगले वर्ष,
दृगन की-आँखों की,
लत्ता-कपड़े,

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 6

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share