गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

होता वही ख़ुदा को जो होता कुबूल है

बेकार सोचना है कलपना फ़िज़ूल है
होता वही ख़ुदा को जो होता कुबूल है

दाना अनाज का ये कमाते हैं इस तरह
मेहनतकशों का रिज़्क़ सदा बा उसूल है

फितरत तो खोलती है हक़ीक़त निहाँ है जो
चेहरे पे आदमी के मुखौटा फ़िज़ूल है

देगा जवाब कौन कोई सामने नहीं
टूटा है दिल किसी का किसी की तो भूल है

ज़ज़्बा न दिल में प्यार का ज़रदार के कोई
आँखों में दौलतों की पड़ी सिर्फ़ धूल है

बेशक़ हो जश्ने-ज़ीस्त या बज़्मे-तरब कोई
हंसते नहीं हैं होंठ अगर दिल मलूल है

कैसे न सिरफिरा भी कहें लोग सब उसे
लाने गया जो फूल वो लाया बबूल है

मिल जाए ज़िन्दगी में मुहब्बत किसी की गर
‘आनन्द’ फिल्म ज़ीस्त की पैसा वसूल है

शब्दार्थ:- रिज़्क़ = food, ज़रदार = मालदार/धनवान, तरब = joy/cheer, मलूल = sad

– डॉ आनन्द किशोर

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