गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

है याद मुझे कोयल की कूक व अमराई

ग़ज़ल
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221 1222 221. 1222

तकिये को भिगो देती जब याद मेरी आई
वो मेरी मुहब्बत को अब तक न भुला पाई

हम करते रहे उससे दिन रात वफा लेकिन
पर हमको सितमग़र से मिलती रही रुसवाई

दे दे के सदा उसको हमने तो बुलाया पर
मिलने को कभी हमसे मगरूर नहीं आई

तारीफ़ करे कोई क्या तेरे शबाहत की
जैसे कि किरन कोई पूरब से निकल आई

पहले ही तड़पता है ये दर्द से दिल मेरा
इक टीस जगाती है जब चलती ये पुरवाई

बरबाद किया मुझको अपनों ने मुहब्बत में
मैं आज तमाशा हूँ वो लोग तमाशाई

वो चाँद भी शरमाए जब देखे तेरा चहरा
जो सादग़ी है तुझमें फूलों में नहीं पाई

वहशत में हैं अब जीते अपने ये वतन वाले
ये कैसी तनफ़्फुर की हर सिम्त घटा छाई

दिल मेरा मचलता है अब बाँध लूँ मैं सेहरा
जब घर में पड़ोसी के बजती है ये शहनाई

है चीज यहाँ दौलत जो खून करा देती
फिर भूल मरासिम को लड़ते हैं सगे भाई

जब वक्त हो गर्दिश का कोई साथ नहीं देता
है बात न गैरों की दे साथ न परछाई

परदेश में आकर के भूले न वतन अपना
है याद मुझे कोयल की कूक व अमराई

दुशमन भी दगा ऐसे देगा न किसी को भीे
जो आज दगा हमनें तुमसे है सनम खाई

ये नाज़ो अदा “प्रीतम” उसकी है निराली ही
लगता है सदाक़त वो कलियों से चुरा लाई

प्रीतम राठौर भिनगाई
श्रावस्ती (उ०प्र०)
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