है मुझे भी इंकार प्रिये

शीर्षक-है मुझे भी इंकार प्रिये

जब मैं बीच समन्दर मझदार में था
जब लहरों में बिन पतवार था
जब वक़्त मेरा ,तेरे इंतज़ार में था
था तुझे इंकार प्रिये
था तुझे मेरा प्रेम अस्वीकार प्रिये

रूप लावण्या तुम थी बहुत
मेरा प्रेम भी स्थायी था
जब तुम्हारी बाहें होती थी
किसी के गले का हार प्रिये
आँखों से बहते रहते प्रेम के अश्रुधार प्रिये
मैं फिर भी करता तेरा इंतज़ार प्रिये
तुम थी मेरे प्रेम का आधार प्रिये

अब वक़्त के साथ चलते-चलते
ना चिन्ह कोई प्रेम शेष रहा
ह्रदय में ना हीं तेरा कोई अवशेष रहा
घाव तेरे बिछोह के भर दिए वक़्त ने प्रिये
अब मुझे भी नहीं तेरा इंतज़ार प्रिये
है मुझे भी इनकार प्रिये
अब मुझे भी साथ तेरा ना स्वीकार प्रिये—-अभिषेक राजहंस

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