कविता · Reading time: 1 minute

हृदय

“ह्रदय”-
है अथाह गहरा, नीला समुद्र सा मेरा ह्रदय
जिसमें सोच भी लहरों सी है
जो कभी गिनी ही नहीं जाती .
चाहा बहुत ठहर जाऊँ अब
पर मेरी सोच है के ठहर नहीं पाती
दूर दूर तक सूना है जीवन और हम हैं ज़जबाती
यही सोच रूपी लहर है जो सूनेपन में है डराती
सागर सा, भरा है अब दुखों से मेरे
मेरी बदरी सी आँखे रहती हैं नीर बहाती
दिखने में कितना शांत है ये मेरा ह्रदय
पर भरा है गहराई है के नापी ही नहीं जाती
लगता है ये तुफान है जो ठहरा है बस कुछ पल के लिये
ह्रदय की धड़कन है के रुक ही नहीं पाती .

– नीलम शर्मा

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