Skip to content

हृदय पुलकित//मन भाव-विभोर*

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

October 31, 2017

*मैं नहीं देखूं
रुप रंग कालो कलूटों
मेरो तो बस महेंद्र अपनो,
सुपणा जैसो हकीकत सै,

मेरे मन नै भा गयो,
हिय पुलकित भयो,
कोण कहे कद मे छोटो सै,
मन भायो जुग भयो
मैंने सुण राखी सै,
.
सबन नदी और नारो,
सामुदर न तरसै सै,
सूरज को धरती तरसे,
मने पढ़ राखी सै,
.
प्रेम प्यार वा विरह रस,
सूक्ष्म तै सूक्ष्म
विराट फैले तै सिख सै,
सामुदर सबन को,
महेंद्र एक मेल-भा मिलावै सै,
.
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
रेवाड़ी(हरियाणा).
एक क्षण मेरा हृदय,
प्रेम विरह रस में डूबकी लगा बैठा,
और शब्द मिले,

Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !
Recommended Posts
विराट पर्व:तेरे जैसी बीर दुसरी जहान मैं कोन्या
विराट पर्व: नंदलाल जी की एक बेहतरीन रचना.... टेक: तेरे जैसी बीर दुसरी जहान मैं कोन्या, तुर्की बेल्जियम अमेरिका जापान मैं कोन्या। लरजती कदली तरह... Read more
किस्सा - बीजा सोरठ
मास्टर श्रीनिवास शर्मा की ग्रन्थावली से यह रागनी किस्सा - बीजा - सोरठ वार्ता - जब राजा जैसलदे उस परी को अपने साथ ले आता... Read more