Skip to content

हूँ रक्त मैं, तो भी विरक्त!

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

November 25, 2016

हूँ रक्त मैं, तो भी विरक्त!

आखिर किस अकथ और अतृषित
इच्छा के वशीभूत होकर मैंने ये कहा,
मायने नही रखता,
बल्कि यह तो तुम्हारा पहले मुझे आगोश में समेटकर
तदन्तर उस विस्मृत कर देने वाली प्रवर्ति का परिणाम हैं

बल्कि यह तो उस प्रवर्ति का परिणाम है जिसमे थमा दिया तुमने मेरे हाथ में एक झुनझुना ,
निकालकर घुंघुरू उसके फिर कहा
‘इसे बजाओ।’
क्षोभ की उस अनंत सीमा तक ,
जिसमे कभी तुम अहंकारी हुई, कभी मैं अहंकारी हुआ
जिसमे कभी जीर्ण रहा मैं, और कभी शक्त,
बरबस ही कह उठा
हूँ रक्त मैं, तो भी विरक्त!

क्योंकि बजता रहता है
टन-टन-टन एक दुर्निवार आर्तनाद…
विव्हल करता है मुझे हरबार,
और जमाना कहता है कि सुन ले
मंदिरों की घंटियाँ बज रही है
देखा मैंने कभी तर्क को, दंतकथाओं के ऊपर आते
कभी नीचे जाते,
हिचकोले खाता रहा मैं ,
और अंततः समन्वय का नया सूत्र भी पा लिया
तो भी यह अंत नही था ,
बना असत्य वाला कृष्ण, बना असत्य वाला भक्त,

हूँ रक्त मैं, तो भी विरक्त!

– नीरज चौहान

Share this:
Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you