Sep 16, 2016 · कविता

हूँ मै नारी/मंदीप

हूँ मै नारी,
डरती हुई नारी,
पल पल मरती हूँ नारी,
बजारू नजरो से बचती हुई नारी।
हूँ मै नारी….

बिलकती हुई नारी,
खुद को बचाती हुई नारी,
अपनों का जुल्म सहती नारी,
अपनी ही किस्मत को कोसती नारी।
हूँ मै नारी….

घर की लाज बचाती नारी,
अपने सपनो को मरती नारी,
अपने आँसुओ को गिनती नारी,
अपना पेट काट दुसरो का पेट बरती नारी।
हूँ मै नारी….

कोख में मरती नारी,
दहेज की आग में जलती नारी,
घुगट की आग में रहती नारी,
माँ बाप की लाज बचाती नारी।
हूँ मै नारी….

सब्र का घूंट पीती नारी,
प्यार को तरसती नारी,
घर में ही दफन होती नारी,
गैरो की नजरो का बलत्कार सहती नारी,
हूँ मै नारी ….
हूँ मै नारी…….

मंदीपसाई

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नाम-मंदीप कुमार जन्म-10/2/1993 रूचि-लिखने और पढ़ाने में रूचि है। sirmandeepkumarsingh@gmail.com Twitter-@sirmandeepkuma2 हर बार अच्छा लिखने...
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