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हुस्न की बिजलियाँ

Govind Kurmi

Govind Kurmi

गज़ल/गीतिका

February 23, 2017

गिराकर वर्क हुस्न की वो यूँ ही निकल गई

भरी वज्म आशिकों की उन पर मचल गई

कई घायल कई मदहोश कई पागल हो गये

जिन जिन पर उनकी एक दो नजरें फिसल गई

जो रौनक आ जाती है चांद से तारों में

वो रौनक लाती है वो लाख हजारों में

क्या कहने उनको बनाने वाले के

पतझड़ को भी बदल देती है जो बहारों में

चेहरा नवाबी उनका अंदाज नुराली है

कैसे कहुँ शब्दों में उनकी हर बात निराली है

सबसे जुदा वो तो सबसे अलग है

उनका सारा हुस्न कुदरत पर सवालि है

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Author
Govind Kurmi
गौर के शहर में खबर बन गया हूँ । १लड़की के प्यार में शायर बन गया हूँ ।