कविता · Reading time: 1 minute

हुनर

हुनर

——

जीवन

कैसा सफ़र है

कहीं हरियाली

तो कहीं

पतझड़ का असर है

जीने की अन्तहीन ख़्वाहिश

पर ज़िन्दगी मुख़्तसर है

ज़मीं से आसमाँ तक 

लम्बा सफ़र है

ऊँची-नीची राहें

पथरीली डगर है

हर दिशा, हर कोण का

जाने क्या असर है

चढ़ाव से भयानक उतार

और.. उतार से भयानक 

समतल जीवन

जिसमें न जाने क्या-क्या

रहा बिखर है

उम्मीदों की मौत

ख़्वाहिशों का क़त्ल

इच्छाओं की अकाल मृत्यु

संवेदनाओं की शून्यता

और…ज़िन्दगी की 

कभी पकड़ में न आने वाली

भागमभाग

इन सभी के बीच 

‘तनहा’ मन और 

जिजीविषा के साथ

ज़िन्दा रहना ही 

हुनर है।

©-डॉ० सरोजिनी ‘तनहा’

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