कविता · Reading time: 1 minute

हुई सुबह

मधुर बयार
चिड़ियों की चहक
कोमल उष्ण
रवि की रश्मियां
छायी मंद-मंद शीतलता
पादप पुष्प पर
तितलियों का डेरा
कुसुम सुवासित
महका उपवन
भोर की बेला
मन प्रफुल्लित
हृदय है प्रशांत
मुग्ध मन मोहित
टुनुन – टुनुन
मंदिर की घंटी
की सुमधुर धुन
भोर हुई प्रभु की
जागी सृष्टि
जागी गइया
संग – संग छौना
हरित धरा पर
हरा बिछौना
नाचे मयूरा
निरखे मोरनी
शाख – शाख
सुर लहरी शुक की
गूंजे गूं – गूं
दाना चुगते
श्वेत कपोत युगल
बहे तरंगिनी
कल-कल धारा
उठो सवेरा हुआ हमारा।

—-रंजना माथुर
दिनांक 09/04/2018
जयपुर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
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