हीरा देवी

उस दिन जो सांवली सी अधेड़ उम्र की मरीज़ा स्टूल पर मेरे सामने नील कमल की कली जैसी अपनी बड़ी बड़ी आँखों सहित एक भावहीन चेहरा लिए एक प्रतिमा स्वरूप मेरे सामने बैठ गई मैंने उससे पूछा क्या तकलीफ है तो वह अपने साथ आए व्यक्ति की ओर देखने लगी जो उसके पास में खड़ा था जिसके चेहरे पर चेचक के कई दाग थे बाईं आंख फूटी थी अर्थात सही अर्थों में काना कुतरा होने की परिभाषा उस पर चरितार्थ थी बाकी उसकी कद काठी ठीक थी , की ओर आशापूर्ण नेत्रों से निहारने लगी । दोनों ही अधेड़ उम्र के थे ।उसे निरुत्तर देख मैंने दोबारा फिर वही प्रश्न पूछा
तुम्हें क्या तकलीफ है ?
क्या परेशानी है ?
तो वह फिर अपनी उसी निश्चल पोपली ( दन्त विहीन ) हंसी ओढ़ कर उस परुष की ओर मुंह उठा कर देखती रही ।
अब साथ आए व्यक्ति ने बताया कि साहब यह हिंदी नहीं जानती बंगाली बोल लेती है इसको शुगर का मर्ज है जो 500 से ऊपर रहती है कमजोरी रहती है हाथ पैरों में सुन्नी और जोड़ों में दर्द है ।
उसकी इन तकलीफों को तस्दीक करने के लिए मैंने उस महिला से फिर पूछा यह जो कह रहे हैं ठीक है ? मेरी बात समझ रही हो क्या ?तुम्हें यही तकलीफें है ।
पर वह फिर सरल भाव से हंसने लगी । उसका मुंह पोपला था और हंसते समय ऐसा लगता था जैसे किसी ने पेड़े को अंगूठे से दबा कर छाप छोड़ी हो । उसे कुछ भी पूछो बस हंसने लगती थी और अपने साथ आये व्यक्ति की ओर देखने लगती थी ।
अब मैंने उस साथ आये व्यक्ति से पूछा ‘ यह आपकी कौन है ? ‘
तो उसके साथ एक दो लड़के और आए थे उन्होंने साथ आये व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए बताया की ये इनके साथ हमारे घर में रहती हैं ये इनको मुंगेर के पास कोयले की खान के इलाके से ले कर आये थे । इनसे इनकी शादी नहीं हुई है ।
मैंने उनसे पूछा कि कैसे लाये थे ?
तब उन लोगों ने बताया कि आज से करीब 25 साल पहले वो इसे ₹ 3000 में मोल लेकर आये थे ।
अधिक कुरेदने पर उस व्यक्ति ने संक्षिप्त में बताया की वो वहां जा कर तीन दिन रुक कर इसका चयन कर वहां से कोयला ढोने वाले एक ट्रक में साथ बैठकर यहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ले आया था ।उसके बाद से फिर वापिस ये अपने घर कभी नहीं गयी । उस समय इसकी उम्र करीब बीस वर्ष की थी ।
मैं उस महिला से बहुत कुछ पूंछना चाहता था पर वही भाषा की दीवार आड़े थी । पूछना चाह रहा था ऐसे 3 दिन की पहचान में कैसे वह जीवन भर के लिए किसी काने कुतरे के साथ चल पड़ी ।अब वो कैसे हर बात में टुकुर टुकुर अपने खरीदार को अपना पालनहार समझ निहारने में ही अपनी भलाई समझती है।
मैंने यथोचित इलाज जो लगभग ₹ पांच हज़ार प्रति माह का था उसे लिख दिया जो सहर्ष उस भले इंसान ने उन दवाइयों को खरीद कर उसे दिलवा दिया ।वह उसके साथ खुशी खुशी मेरे कमरे से बाहर की ओर निशब्द चल पड़ी ।वह हर हाल में खुश थी जिस हाल में भी भगवान ने उसे संसार में भेजा जैसे पली बढ़ी जिसका भी साथ मिला और अब इस मधुमेह की बीमारी की तकलीफों के बावज़ूद वह संतुष्ट सी थी , खुश थी । उसके बाद भी वह कई बार दिखाने आई कभी अपने भरतार तो कभी किसी और के साथ ।यहां उसके परिवार वालों ने उसके इस लिव इन सम्बन्ध को मंजूरी दे दी थी ।वो लोग इस बात से भी अन्जान थे कि सन 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को धर्मपत्नी के समस्त संवैधानिक अधिकार दे दिये हैं । कोयले की खान में काम करने वाले कामगारों की परिस्थितियां बड़ी दुरूह एवम दुष्कर है । उन इलाकों में कोयले के अलावा कोई अन्य कमाई के खेती बाड़ी जैसे संसाधन न के बराबर है पानी भी बहुत कम है , अतः लोग बहुत अभावों में कठिन जिंदगी गुज़र बसर करते हैं । ऐसी कन्न्याओं को सम्भवतः बचपन से यही समझाया जाता हो गा कि एक दिन कोई आये गा और तुम्हें कहीं दूर ले जा कर तुम्हारा जीवन संवारे दे गा ।
कभी-कभी कोयले की खदानों में उच्च ताप एवं दबाव की वजह से कुछ कोयले के टुकड़े हीरे में बदल जाते हैं वह महिला भी जिंदगी की विषम परिस्थितियों के दबाव में रह रह कर हीरे की तरह निखर आई थी । मुझे अब याद नहीं कि मैंने पर्चे पर उसका क्या नाम लिखा था पर उसके जाते जाते मैंने मन ही मन ससम्मान उसका नाम हीरा देवी रख दिया ।
हीरा देवी तुम्हारे जीवन की परिवर्तनशील विषम परिस्थितियों को सहज स्वीकार कर उनमें संतुलन बनाये रखने की तुम्हारी अद्भुत , अद्म्य , साहसी क्षमता को प्रणाम ।

3 Likes · 6 Comments · 47 Views
You may also like: