कविता · Reading time: 1 minute

हिन्दी भाषा

नहीं नये नवरत्न,
नहीं कुछ नई अभिलाषा।
सकल भू विख्यात हो,
भारत की हिन्दी भाषा।।
– भविष्य त्रिपाठी।

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मैं कौन हूँ? मैं हूँ भविष्य भव-सागर तरुण-सा इक तरुवर। किंचित भविष्य के भय से भ्रमित मानव नश्वर। आया हूँ धवल चित्त पर नवल वसन सी देह चढ़ाकर। बैठा हूँ…
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