कविता · Reading time: 1 minute

हिन्दी जब हिचकोले लिया करती

हिन्दी जब हिचकोले लिया करती
शिशु की पदचापों में थिरकती है
नन्हा सा निर्दोष बोले जब ‘ माँ ‘
सुनकर माँ फूली नही समाती है

अर्ध शब्द हो स्फुटित मुख से जब
हिन्दी आगे बढ़कर बाँहे फैलाती है
बड़ा हो चला पढ़ने को विद्यालय
हिन्दी कदम से कदम मिलाती है

युवावस्था में लड़खड़ाये जब पग
हिन्दी प्यारे सखा सी समझाती है
नादानियाँ प्यार में अच्छी नहीं है
एकांत में ले समझदारी सिखाती है

दुनियां के लेन देन में लग जाता जब
तब व्यवहारिकता भी सिखलाती है
जन्म से ले जीता है जब तक इन्सान
दामन हिन्दी थामे उसका रखती है

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डॉ मधु त्रिवेदी शान्ति निकेतन कालेज आफ बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर साइंस आगरा प्राचार्या, पोस्ट ग्रेडुएट कालेज आगरा *************** My blog madhu parashar.blogspot.in Meri Dunia कोर्डिनेटर * राजर्षि टंडन ओपन…
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