हिन्दी की आत्म कथा

हिन्दी की आत्मकथा
मैं हिन्दी हूँ, देव भाषा संस्कृत से मेरा प्रादर्भाव हुआ है। मेरे जन्म काल का वास्तविक पता न तो मुझे है न ही इतिहास को क्योकि युगो युगो से भारत ही साक्षी है।भारत और मेरा सम्बन्ध चोली-दमन की तरह है।भारत को विश्व का सर्वश्रेष्ट देश होने का समय मैने देखा है,उस समय मैं भी उत्कृट स्थान पर रहते हुए सफलता की कामना करती थी।
अनुवॉंशिक गुणों के कारण ५२ अक्षरों से दुनिया के समस्त उच्चारण,ध्वनि को व्यक्त करने की सामर्थं मुझ में समाहित है। सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली एवं समझे जाने वाली भाषा होने का गौरव भी प्राप्त है।
परन्तु भारत की परतंत्रता के समय कई विदेशी भाषायों के आगमन से मेरी सम्प्रभुता को नष्ट करने की चेष्टा की गई।मैने अपने लचीले स्वभाव व सरलता पूर्ण व्यवहार से सभी को आत्मसात कर अपने कोश का ही विस्तार कर लि़या तथा विदेशी भाषायों को पंगु बना दिया ।देश की आजादी की जंग में कोने कोने तक संदेश भेजने,जन जाग्रति लाने,एकजुट करने का काम कविता, कहानी, कथा एवं गीतो के माध्यम से मेरा द्वारा ही होता रहा।इस समय के महापुरूषों रवीन्द्रनाथ टैगोर,महात्मा गॉधी,सुभाषचन्द्रबोस तथा जवाहर लाल नेहरू आदि ने देश के विकास का श्रेय मातृभाषा को ही बताया साथही मुझ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहा।लेकिन
कुछ षडयंत्रकारी विदेशी दासता
के हमसफर मुट्ठी भर लोगो ने शासन और शोषण करने मेरी उपेक्षा कर दी। संविधान मे १५ वर्ष तक अंग्रेजी को मुख्य तथा मुझे सहायक माना गया।इस चूक का ही परिणाम है कि आज भी आजादी व गुलामी का फर्क अनपढ भोले भाले ग्रामीण नहीं जान पाये।
कानूनी काम ,दफ्तर काम ,पढ़ाई सभी विदेशी भाषा में होने से समाज शासक वर्ग और शोषित वर्ग में विभाजित होता जा रहा है। भारत के साथ आजाद होने वाले देशों की तुलना में भारत पिछड़ा देश है जबकि अन्य आगें निकल गये। इसका मूल कारण मातृभाषा मुझ हिन्दी को तिरस्कृत करना है। जब मेरे अपने ही अपने ही हिन्दीभाषी क्षेत्र में विदेशी भाषा बोलते है तो मुझे वो दुर्दिन याद आते है जैसे शासक परदेशी हो।
१४सितम्बर हिन्दी दिवस सन१९५३ से मनाने की परम्परा सिर्फ एक राजनैतिक सोच प्रदर्शित करता है। एक दिन की चॉदनी फिर अंधेरी रात को चरितार्थ
करने वाली कहावत है ।
। जयहिन्द।

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