हिंसा ठीक नहीं

हिंसा ठीक नहीं
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प्रबल हिंसा आग में,झुलस उठा करनाल।
पुलिस प्रशासन देखिए,कैसे करे बबाल।।
कैसे करे बबाल,गुरु-शिष्य को है पीटे।
निंदनीय ये घोर,गैरकानूनी छींटे।
बातचीत से एक,सुंदर निकलता जी हल।
शिक्षा-मंदिर घेर,क्यों हो गए तुम प्रबल।

जिस गुरु से तुम सीख के,पद पाते हो नेक।
उसपर उठना हाथ तो,नीच कर्म है एक।।
नीच कर्म है एक,गुरु राष्ट्र का निर्माता।
मिलता उसको मान,वो फूला ना समाता।
बदलो अपनी सोच,समझो मोल तुम तरु का।
छाया दे तप धूप,वो ही रूप है गुरु का।

उचित माँग पर मानिए,धरना देना ठीक।
समझ मर्म कर शांत जी,ये संस्कृति की लीक।।
ये संस्कृति की लीक,भूले से भी न भूलो।
सही मार्ग को ढूंढ,मंज़िल अमन की छूलो।
देश विदेश पहुंची,ख़बर अच्छी न कदाचित।
सुनिए जन आवाज़,कीजिए मान गर उचित।

इक छात्र मौत दर्द रे,क्या कम था ये सोच।
आतंकी-व्यवहार फिर,अरे हृदय ले नोच।।
अरे हृदय ले नोच,इसपर करुणा न जागी।
अपने घर भी पूत,सूरत कहाँ फिर भागी।
सुन प्रीतम की बात,दो खुदी-सा प्यार तनिक।
बनो सभ्य तुम आज,यही विनय करूँ मैं इक।

आर.एस.बी.प्रीतम
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