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हास्य-व्यंग्य-परिहास

हास्य-व्यंग्य-परिहास,
खुशी के अवयव हैं ख़ास।
शिष्ट हास्य चिंतित मन को-
बहलाता है।
व्यंग्य चुटीला बिना तनाव के-
लोगों की कमियां बतलाता है।
होते हैं तन-मन प्रफुल्लित
जब करे कोई परिहास।
महफ़िल में जब हास्य व्यंग्य के,
गूँजते तराने।
लोट पोट होते हैं सब,
सयाने और अयाने।
हो जाते हैं सब प्रसन्न,
नहीं रहता कोई उदास।
व्यंग्य वाण नहीं घायल करते –
शरीर।
करते सुसुप्तता पर चोट,
जगाते ज़मीर।
होते हैं निष्क्रिय जन क्रियाशील,
भाग्योदय की जगती आस।
हास और परिहास से,
होते हैं प्रफुल्ल मन।
मनहूसियत होती है दूर,
दमकने लगते हैं तन।
होने लगता है खुद पर भरोसा,
ठाठें मारता आत्मविश्वास।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

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