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हास्य *लेख *”पगडण्डी पर बने स्लोप”*

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

लेख

September 19, 2017

एक रात रास्ते से ..गुजरते हुए,
मुश्किल में ..जान पड़ गई,
मोहल्ला भी ..अनजान था,
.
गुजरते तो ..सभी है,
पर मेरा पांव ..
स्लोप पर पड़ फिसल गया,
और धड़ाम से..गिर गया,
.
कोई पास न आया,
शायद ..सोचकर ..कि शराबी है,
.
हम क्यों ? उलझे भला ,
.
बेहोश समझ ..एक कुत्ता पास आया,
आदत से लाचार…. बेचारा,
आखिर वही काम आया,
उसी ने न जाने क्या ?? सूंघा ??
टांग उठाई…और मंत्र-सा पढ़ दिया !
.
होश में आया तो ..लोगों की भीड़ खड़ी थी,
.
सभी में व्यर्थ चर्चा ..हो रही थी,
मेरे घर भी ..खबर पहुंच चुकी थी,
.
मेरी ही चर्चा ..सबके मुख पर थी,
क्यों गिरा?
कैसे गिरा?
.
पर उस स्लोप पर
किसी की नजर नहीं पड़ी ,
जो रस्ते मे उसके नाम पर ईंटें खड़ी थी,
जिस कारण भीड़ जुड़ी थी,
.
दोस्तों दुनिया का दस्तूर निराला है,
ये दुनिया ऐसे ही चलती है साहेब !
.
बुरा बुरा सब कह ..बुराई देखे न कोई,
जो देख लें बुराई…..बुरा बचे न कोई,

साभार प्रस्तुत:-
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,

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Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !

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