कविता · Reading time: 1 minute

हाल मेरे वतन का है बदहाल दोस्तों

हाल मेरे वतन का है बदहाल दोस्तों
डोर किस के हाथ में ना जाने दोस्तों

एकता है वतन की विखंडित हो गई
इंसानियत इन्सान की दंडित हो गई
इंसान ही इंसान का दुश्मन है दोस्तों
डोर किसके हाथ मेंं,ना जाने दोस्तों

हर रोज यहाँ जंग है जन की जन से
मिटती नहीं प्यास बहती खून बूंद से
हर दिन यहाँ चिंगारी सुलगती दोस्तों
डोर किसके हाथ में,ना जाने दोस्तों

संस्कृति और संस्कार दफन हो रहें
जीवन- मूल्य यहाँ पर खत्म हो रहे
गिर रही यहाँ इंसान-औकात दोस्तों
डोर किसके हाथ में,ना जाने दोस्तों

धर्म और जातियों में है देश बंट रहा
कोहरा नफरतों का नहीं है छंट रहा
भाईचारा सियासत-बलि चढ़ा दोस्तों
डोर किसके हाथ में,ना जाने दोस्तों

भाई,भाई का नही अब मीत है यहाँ
प्रीत की रीत बनी यही गीत है यहाँ
सुखविंद्र, देशभक्ति का लोप दोस्तों
डोर किसके हाथ में,ना जाने दोस्तों

हाल मेरे वतन का है बदहाल दोस्तों
डोर किस के हाथ में,ना जाने दोस्तों

-सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
9896872258

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