कविता · Reading time: 1 minute

” हार – जीत का छोर नहीं है ” !!

जन्मघुट्टी में यही मिला है ,
पुष्प सदा काँटों में खिला है /
संकल्पों का खेल है जीवन ,
लक्ष्य बिना बेमेल है जीवन /
अँधियारा फिर लौट न पाए –
ऐसी कोई भोर नहीं है //

सूख -दुःख के अनुभव होते हैं ,
कुछ पाते हैं ,कुछ खोते हैं /
खुशहाली ,कभी गम मिलते हैं ,
आँखों में आंसू पलते हैं /
बुरे वक़्त को बाँध सके जो –
ऐसी कोई डोर नहीं है //

रुखी-सूखी ही मिलती है ,
पटियों पर रातें कटती हैं /
रुपयों से रूपया टकराए ,
हम ना संचित धन कर पाए /
पीड़ा ने जिसको न छुआ हो –
ऐसा कोई पोर नहीं है //

मेहनत से सब कुछ पाया है ,
हार -जीत को अपनाया है /
बड़े चैन से हम सोते हैं ,
अकसर ख्वाबों को बोते हैं /
अपनी गठरी ले जाये –
ऐसा कोई चोर नहीं है //

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