कविता · Reading time: 2 minutes

हाय री बिटिया

कविता —

शादी के जोड़े का फंदा बनाकर
एक बेटी मर जाती है फाँसी लगाकर
बेटी तो मर गई उसकी आत्मा पसर गई
रो-रोकर कभी सुबक-सुबक कर कभी
चिल्ला-चिल्ला कर पूछे समाज से हज़ारों सवाल —-

क्यूँ किया गया मेरे साथ जघन्य कुकृत्य ?
क्यूँ किया गया मेरे संग अक्षम्य अपराध ?
क्यूँ किया गया मेरे संग विवेक हीन कुकर्म ?
क्यूँ किए गये मेरे संग इतने जुल्म-ओ-सितम ?
क्यूँ होना पड़ा मजबूर खुदकुशी के लिए ?
क्यूँ मैं तरसती रही सदा खुशी के लिए ?
मैं भी तो किसी की दुलारी बेटी थी !
मैं भी तो किसी की प्यारी बहन थी !
मैं भी तो किसी आँगन की कली थी !
मैं भी तो किसी के घर की मर्यादा थी !
फिर क्यूँ बन गए सब मेरे ज़ालिम बेरहम ?

बेटी की आत्मा
ना मिल सकी परमात्मा से
दर-दर भटकती, घर-घर गरजती
कभी मैदानों में
तो कभी सुनसानों में
कभी राहों में तो कभी चौराहों में
ऐसे भटते-भटते वो पहुँचती है अपने घर पे
और खड़ी होती है अपने बाप के आगे
और पूछती है एक हृदय विदारक सवाल —
बापू मैं तो तेरे आँगन की कली थी
जैसे-तैसे मैं तेरे घर में भली थी
फिर क्यों तूने मुझको ब्याहा
पराया पुरूष संग पराये घर में पठाया
कैसे निर्दय, बेदर्द, जालिमों के घर बैठाया ??
बूढ़ा बाप सुनके सवाल
कुछ ना कह पाया
फुट-फुट कर रोया और पछताया

जब आत्मा बेचारी
ढूढ़ती है माँ को मारी-मारी
तब ढूढ़ ना पाती है माँ को दुलारी
फिर लौट के आती है अपने बापू के अगाड़ी
और पूछती है ” बापू ! माँ कहाँ हैं,
माँ दीखती नहीं है ?”
तब बाप भी फफक-फफक कर रो पड़ता है
और रोते-रोते कहता है —-
“तेरी माँ तो तेरे दु:ख में पागल हो गई
तेरे मरने के ग़म में हम सबको छोड़ गई ”
इतना सुनते ही बेटी की आत्मा
वहाँ रुक नहीं पाती है
भैया को खोजने अन्य कमरों में
चली जाती है

उसका भैया बेहोश खाट पर पड़ा था
अपनी बहन की मौत के गम में डूबा था
” भैया ! भैया ! ” की आवाज़ सुन कर वह
हडबड़ा जाता है
“कौन ? कौन ?” हड़बड़ाहट में पूछ बैठता है
“आपकी बहन– अनु !”
बेटी की आत्मा कह पड़ती है —
” भैया, मैं अनु की आत्मा हूँ
आप सबों के लिए मैं सपना हूँ
उन जालिमों ने मुझको बहुत सताया
एक-एक खुशी के लिए मुझको तरसाया
वे सारे बड़े जालिम और बे-दर्द इंसान थे
वे बहशी, दरिंदे, बड़े जुलमी हैवान थे
आप उनको कभी छोड़ना नहीं
मुझे न्याय दिलाने से मुँह मोड़ना नहीं
आप कुछ ऐसा कर के ही छोड़ना
नारी को समाज में समता से जोड़ना
उसके मान-सम्मान को लौटा कर
ही तुम अपना दम तोड़ना !”

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दिनेश एल० ” जैहिंद”
11. 02, 2017

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Author
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि…
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