कविता · Reading time: 1 minute

हां नारी हूँ

” मैं चपला सी तेज युक्त
नभ तक धाक जमाऊँ

आ सूरज, तेरी किरणों से
अपना भाल सजाऊँ

कभी धरा- गांभीर्य ओढकर
मौन का काव्य सुनाऊँ

तितली से लेकर चंचलता
फूलों से रंग चुराऊँ

सरिता सी कल-कल बहती
बाधा से रुक ना पाऊँ

मैं स्वयं भोर की उजली
दुःख तम से क्या घबराऊँ

हाँ नारी हूँ , मैं कोमल मन
पर अबला नहीं कहाऊँ….””

**अंकिता**

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