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हस्ती

ये ग़ज़ल भगवत भाव में लिखी है। उनकी कृपा बिना हम कुछ भी नहीं है।
“हस्ती “

मैं चीज़ थी क्या, मैं एक खाक थी
तूने छुआ मुझे जो, मैं इत्र लाज़वाब थी।

मेरा नहीं था कुछ भी, सब तेरा दिया हुआ था
तूने दिया ना होता, मैं खाली शबाब थी
मैं चीज़ थी क्या, मैं एक खाक थी

चर्चे जहां में होंगे, लाख मेरे शबाब के
तू ये दिल ना देता, तो मेरी शख्सियत खराब थी.
मैं चीज़ थी क्या, मैं एक खाक थी

मेरी हस्ती भी क्या है, तेरे इस जहान में
गर तू शौहरत ना देता, तो मैं गुमनाम थी.
मैं चीज़ थी क्या, मैं एक खाक थी

तूने की जो रहमत मेरे मालिक
मैं एक महका गुलाब थी .
मैं चीज़ थी क्या, मै एक खाक थी
तूने छुआ मुझे जो, मैं इत्र लाज़वाब थी.

✍वैशाली 💞
19.11.20

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Vaishali Rastogi
Vaishali Rastogi
SAMBHAL. MORADABAD
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मुझे हिंदी में काफी रूचि है. विदेश में रहते हुए हिन्दी तथा अध्यात्म की तरफ...
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