कविता · Reading time: 1 minute

रेखाएँ सब कुछ कहतीं हैं

रेखाएँ सब कुछ कहती हैं
हथेली के धरातल पर
सरिताओं जैसी बहती है

पढ़ने वाले पढ़ लेते हैं
अर्थ इन्हीं के गढ़ लेते हैं

मील का पत्थर मान इन्हें
मंजिल तक बढ़ लेते हैं

ये अनजानों के लिए तो
कोरा कागज रहतीं हैं
रेखाएँ सब कुछ कहती हैं ..

धरा हथेली , जीवन रेखा
निर्मल नदियों जैसा लेखा

जो डूबा है वही तर गया
रहा किनारे तो क्या देखा

राहों की उत्ताल तरंगों
में अल्हड़ता गहती हैं
रेखाएँ सब कुछ कहती हैं …

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