हवा

बह रही अंदर हवा है ।
चल रही बाहर हवा है ।
वक्त के द्वारा जो चलतीं,
आँधियों का डर हवा है ।
एक हवा से दूसरी तक,
दिख रहा मंज़र हवा है ।
जो ख़ुदा तक जा रही है,
वो प्रेम की ख़ब़र हवा है ।
ज़िंदग़ी मिलती है जिससे,
साँस वह सुंदर हवा है ।
खिला दे जो मुग्ध कलियाँ,
सर्जना का हुनर हवा है,

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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02...
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