हवा

बह रही अंदर हवा है ।
चल रही बाहर हवा है ।
वक्त के द्वारा जो चलतीं,
आँधियों का डर हवा है ।
एक हवा से दूसरी तक,
दिख रहा मंज़र हवा है ।
जो ख़ुदा तक जा रही है,
वो प्रेम की ख़ब़र हवा है ।
ज़िंदग़ी मिलती है जिससे,
साँस वह सुंदर हवा है ।
खिला दे जो मुग्ध कलियाँ,
सर्जना का हुनर हवा है,

Like Comment 0
Views 798

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing