Aug 21, 2016 · कविता
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हर सीख बेटियों को——–

नहीं सीख बुरी कोई पर सब बेटियों के लिए क्यों है
नहीं रीत बुरी कोई फिर बेटियों के लिए क्यों है
विवेकपूर्ण परिधान हो है सही ये बात
पर नियंत्रित भी तो रहें दोषपूर्ण निगाह और जज्बात
है मासूमियत भली पर बेटियों के लिये बुरीक्यों है
नहीं सीख——-
क्या मुगल फिर से शासन हो गया फिर से परदा घूंघट चलन हो गया
नहीं अगर तो बेटियो के लिए मानसिकता वही क्यों है
नही सीख———-
क्या साडी में साक्षी का लड़ना सम्भव था
क्या दीपा का प्रदर्शन सलवार कमीज में सम्भव था
इतनी पहरेदारी कर्मो पे न होकर बेटियों पर क्यों है
नहीं सीख——–
गोपी से जाकर पूछो कैसे संधू ने खेला है
लपेट तिरंगे को जिस्म से कैसे चूमा है
समय की मांग पर भी नहीं आज़ादी बेटियों को क्यों है
नहीं सीख ——-
नहीं दौर अभी का ये याद दिलती हूँ
प.टी.उषा,अश्वनी,मल्लेश्वरी,मैरीकॉम गिनाती हूँ
नेहवाल और मिर्ज़ा को भी महत्ता न्यून सी ही क्यों है
नहीं सीख——-
कल्पना,सुनीता भी यदि परिधानों में बन्ध जाती
कतय साख तुम्हारी इतनी विश्व में बड़ पाती
इतनी सी समझ समय पर आती क्यों नहीं है
नहीं सीख——-
दृष्टि दोष करो ठीक समाज ये पुरुष प्रधान
सम्मान करो नारीत्व का इसमें छिपा तेरा अस्तित्व महान
सोचो प्रकृति की तुलना स्त्री की विद्वानों ने की क्यों है
नहीं सीख बुरी———

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Dr.pratibha prkash
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डॉ प्रतिभा प्रकाश पुत्री/श्री वेदप्रकाश माहेश्वरी स्थायी पता मो.राधाकृष्ण ग्राम/पोस्ट अलीगंज जिला एटा उत्तर प्रदेश... View full profile
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