हर पल सोना

_______हर पल सोना_______________
उलझन दुख
आफत का रोना
छोडा़ इनसे लाभ न होना !
भरते घाव कुरेद रहा था !
पिन अन्दर तक छेद रहा था !
हल का भी ऐसा क्या होना
हल से रखे गुरेज रहा था !
वर्तमान के
साथ चला हूं
नही भूत को सिर पर ढोना !
हर संकट का समय काल है !
बुना उसी का मकड़ जाल है !
डटकर साहस
फदे तोडे़
हर पल सजता रहा भाल है !
शुरु किया हूं
पल की खेती
उगा रहा हूं हर पल सोना !
@सर्वाधिकार सुरक्षित
विनय पान्डेय

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