कविता · Reading time: 2 minutes

हर घर इक मधुशाला है

चुंबन करता रोज अहाते में, प्याले को प्याला है !
साकी बन मधुरस बरसाती, नित होठों पर हाला है !!
हर घर इक मधुशाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

बाप का अद्धा क्वार्टर बेटा,
चोरी छिपे चढ़ा लेता !
दोनों को हड़काता चाचा,
भी दो पैक लगा लेता !!
फिर देखो तीनों की चलती, अलग-अलग रंगशाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

हुश्न परी पी रहीं इलेक्ट्रा,
कहाँ किसी से पीछे हैं !
‘पव’ इनसे ही चहक रहे है,
सिगरेट के कश खींचे हैं !!
रोमानो का स्वाद चख रही, कॉलिज की मधुबाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

किटी पार्टी में मदहोशी,
छलकाती है रेड़ वाईन !
सेम्पेन की बरसातों से,
आ जाये चेहरों पर शाईन !!
पतली कमर के प्यालों में क्या, व्हिस्की ने रंग डाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

महफिल अगर रईशों की हो,
तो स्कौच थिरकती है !
सोड़ा के संग मिले वोदका,
सबकी नजर बहकती है !!
अंग-अंग भड़काने वाली, अद्भुत रम की ज्वाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

कम कीमत में मजा डबल दे,
देशी ठर्रा ढोला मारू !
सारी ब्रांड फेल कर देती,
पहले तोड़ की कच्ची दारू !!
थैली पीके गाना बजता, छज्जे ऊपर वाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!

कोई पीता स्कौच प्रेम की,
कोई नफरत की व्हिस्की !
वैसा ही तो नशा चढ़ा है,
जैसी नियत है जिसकी !!
मन को जो मदिरालय करले, रंज उसी ने टाला है !
हर घर इक मधुशाला है !!
✍️ लोकेन्द्र ज़हर

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